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100 पंचतंत्र की कहानियां | Panchtantra Ki Kahaniya In Hindi

100 पंचतंत्र की कहानियां | Panchtantra Ki Kahaniya In Hindi
Panchtantra Ki Kahaniya In Hindi


100 पंचतंत्र की कहानियां | Panchtantra Ki Kahaniya In Hindi
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एक दूसरे के पूरक 


एक समय की बात है एक नगर के पास किसी व्यापारी का नया मकान बन रहा था। वहाँ पर लकड़ी का काम करने वाले कारीगरों ने तो बड़े-बड़े तख्ते बनाए थे। 

उन दोनों तख्तों के बीच में लकड़ी को पकड़कर काटा जाता था। उस जगह से बन्दरों का एक काफिला गुजर रहा था। उस काफिले में एक बन्दर बहुत शरारती था, वह उन दो तख्तों के बीच में खड़ा हो मजे से झूलने लगा। उसे झूलने में बड़ा मजा आ रहा था। 

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एक बार उसने पूरे जोर से छलाँग लगाई। बस! दोनों लकड़ी के तख्ने पूरी ताकत से उठे और बन्दर जी उन दोनों के बीच में ऐसे जकड़े गये कि निकलने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। उसके साथियों ने केवल उसकी अन्तिम चीखने की ही आवाज सुनी।

इस तरह वह बन्दर अपनी ही मूर्खता के कारण मर गया। जो दूसरों के बीच में अपनी टांग अड़ाता है भाई, उसका यही परिणाम होत है। इसलिये समझाता हूँ कि इस सिंह को भूल जाओ और अपनी चिन्ता करो। 

हम इस झंझट में क्यों पड़ें? दमनक उसकी बात से चिढ़कर बोला, "तो क्या आप पर भोजन भद्दा है, यह कहावत सही नहीं, मित्रों का भला और शत्रुओं को हानि पहुँचाने के लिए ही बुद्धिमान मनुष्य राजा का सहारा लेते हैं? 

पेट कौन नहीं भर लेता?" जिसके जीवित रहने से अन्य बहुत-से लोग भी जीवित रह सकें, उसी को जीवित रहना चाहिये। अन्यथा क्या पक्षी भी चोंच से अपना पेट नहीं भर लेता? 

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जो प्राणी न अपने पर, न पराये पर, न बंधुवर्ग पर, न दुःखी पर यानी किसी पर भी दया नहीं करता है, उसका इस संसार में जीना बेकार है।

"माँ की जवानी हरण करने वाले उस पुत्र के पैदा होने का क्या फायदा हो सदैव चोटी पर लहराने वाले झण्डे के समान वंश में अग्रणी नहीं होता. नदी तर पर उपजे एक घास झुण्ड का भी जन्म सार्थक है, 

जिसको थामकर डूबता प्राणी किनारे आ लगता है, नीचे-ऊपर संचरण करते हुए मनुष्य के सन्ताप को दूर करने वाले बादलों में कुछ ही भले मानस पुरुष होते हैं।"

मनुष्य चाहे कितना ही ताकतवर हो, पर यदि उसकी ताकत प्रकट नहीं है तो लोग उसका बहिष्कार करते हैं, क्योंकि लकड़ी के अन्दर व्याप्त आग को सब लोग लांघ जाते हैं, पर जब यह आग बाहर निकलती हुई होती है, तो उसके पास जाने की हिम्मत कोई नहीं करता।'

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करटक ने अपने भाई की बातों को बड़े धैर्य से सुना और बाद में बोला-“यह सब ठीक है किन्तु हम लोग सिंह की नगरी में अप्रधान गौड़ हैं, फिर हमें इस बात से क्या प्रयोजन?" 

देखो कहा गया है, 'स्वामी के सामने जो अप्रधान बिगड़े दिमाग वाला, बिना पूछे बोलता है, उसकी न केवल अवहेलना ही होती है, साथ ही वह अपमानित भी होता है। 

इसीलिए अपनी बात वहाँ कहनी चाहिये जहाँ कुछ फायदा हो, क्योंकि ऐसी जगह बात कहने का ऐसा प्रभाव होता है। जैसा श्वेत वस्त्र पर रंग का।

दमनक ने करटक की बात सुनते ही तुरन्त कहा, “नहीं भाई ऐसा न कहो क्योंकि अप्रधान भी यदि राजा की सेवा करे तो प्रधान बन सकता है। जो प्रधान राजा की सेवा न करे वह अप्रधान बन जाता है।" 

इस तरह कोई व्यक्ति चाहे अनपढ़ ही क्यों न हो यदि वह राजा के समीप है तो उसी को राजा मानता है। जो नौकर स्वामी के क्रोध को सहन कर लेते हैं, वे स्वामी को नाराज की जगह खुश करने में सक्षम होते हैं। 

मनीषियों, बुद्धिमानों, साहसियों का सम्मान राजा के सिवाय अन्य और कोई नहीं कर सकता। जो व्यक्ति अपनी उच्च जाति आदि के अभिमान में डबकर राजाओं के पास नहीं जाते। 

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वे निराशा और असफलता के सिवा कछ भी नहीं प्राप्त करते, राजा का सहारा लेकर ही बुद्धिमान लोग उचित तथा उच्च स्थान पाते हैं, इज्जत पाते हैं, फिर बुद्धिमान लोगों के लिये राजा को वश में करना कोई कठिन काम नहीं है।

“भाई दमनक, आखिर तुम कहना क्या चाहते हो?" मैं तुमसे केवल यह कहना चाहता हूँ कि, “आज हमारा स्वामी और उसका परिवार डरा हुआ है, 

उसके समीप जाकर डर का कारण जानना, फिर सन्धि विरोध लड़ाई, हमला करना, या शान्त रहकर मौके की तलाश करना, किसी ताकतवर का सहारा लेना, राजनीति के दाँव-पेंच हैं ये, भाई इनमें से किसी भी दाँव का इस्तेमाल किया जा सकता है।"

“लेकिन भाई, तुमने यह कैसे जाना कि हमारा स्वामी डरा हुआ है?" करटक ने पूछा।

“मेरे भाई कही हुई बात को तो पशु-पक्षी भी भांप लेते हैं, किन्तु जो बुद्धिमान हैं वे बिना कही बात को भी चेहरे से जान लेते हैं।" जैसा कि मनु जी ने कहा है, 'आकार, इशारा, चेहरे की बनावट, चाल-ढाल, बात-चीत, आँख द्वारा मन के अन्दर की बात जानी जा सकती है।' 

इसी कारण मैंने ये सब जान लिया है। मैं निडर होकर सिंह के पास जाऊँगा और उसकी पूरी-पूरी मदद करूँगा। मगर भाई आपको तो अभी राज-दरबार में जाना ही नहीं आता तो आप मदद कैसे करेंगे?" करटक बोला।

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दमनक ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “वाह! मैं क्या राजा की सेवा करना नहीं जानता, पिता जी की गोद में खेलते हुए मैंने घर में आने वाले साधु, संन्यासियों

और विद्वानों से जो ज्ञान की बातें प्राप्त की थीं वे सब-की-सब मैंने अपने दिल में बैठा ली थीं।” उनका सार इस प्रकार है, इस सुन्दर पृथ्वी को, 'बहादुर', 'विद्वान्' और जो 'सेवा' धर्म जानते हैं, यह तीन प्रकार के मनुष्य को ढूँढ़ा करते हैं। 

सेवा वही है जो स्वामी का हित करने वाली हो, इस प्रकार की सेवा केवल समय पर ही की जाती है। इसलिए विद्वानों को चाहिए कि सेवा द्वारा ही राजा को खुश रखकर उसका आश्रय प्राप्त करें, किसी अन्य तरीके से नहीं।

पण्डित को चाहिए कि अपने गुणों को न जानने वाले की सेवा न करे। जिस प्रकार बंजर जमीन पर हल जोतने और फसल बोने का कोई लाभ नहीं, वैसे ही मन्दबुद्धि वाले जीव से विद्या एवं गुण की बात करना व्यर्थ है।

गराब और छोटे वर्ग के लोग यदि गुणवान हों तो उनकी सेवा अवश्य करनी चाहिए, क्योंकि जीवन में कभी-न-कभी ऐसा वक्त आ ही जाता है जब ऐसे लोग किसी भी समय काम आ ही जाते हैं। चाहे इन्सान भूखा प्यासा बैठा रहे लेकिन जीवन में कभी भी अविवेकी धनवान से सहायता न माँगे।।

जिसका सहारा लेकर एक भूखा नौकर पेट न भर सके, उस राजा का परित्याग कर दें।

राजमाता, राजकुमार, मुख्यमंत्री और राज्यपाल का भी राजा के समान करें। अपने कर्तव्य का पालन करने वाला सेवक सदा राजा को अच्छा लगता है।

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अपने मालिक द्वारा दी गयी रकम से जो सेवक खुश होता है और अपने मालिक का धन्यवाद करता है, वह सेवक सदैव अपने मालिक की नजरों में अच्छा और गुणवान व्यक्तियों में गिना जाता है।
 
जो वीर युद्ध के समय आगे-आगे तथा नगा में पीछे-पीछे और राजमहल के द्वार पर रहता है, वही राजा को अच्छा लगता है। जो सेवक. जए को अपराध, शराब को जहर और पराई स्त्री को बेकार समझता है, वह सेवक राजा को अत्यधिक प्रिय होता है। 

जो प्राणी यह जानते हए भी कि मैं राजा की नजरों में अच्छा और राजा मेरी बात मानते हैं, फिर भी वह विधान और नियम का उल्लंघन नहीं करता वही बुद्धिमान होता है।

जो पुरुष मालिक की अनुचित बात का बुरा न माने और निडर होता है-वह युद्ध में लड़ता है। परदेश को भी जो अपना देश मानता है-वह राजा को सदैव अच्छा लगता है।

“वाह... वाह... बहुत खूब! यह बातें तो, सब ठीक हैं। अब आप यह बताओ कि वहाँ पहुँचकर सर्वप्रथम क्या पूछेगे?" करटक ने मुस्कुराते हुए पूछा।

“यह सब बातें बातों से ही निकलती हैं, जैसे अच्छी बारिश होने पर एक बीज से दूसरा बीज पैदा होता है। किसी के हृदय में पाप होता है, उसकी जबान मीठी होती है। 

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किसी की जबान कड़वी होती है, मन मीठा और किसी की बात भी अच्छी होती है और मन भी साफ, इसलिए मैं ऐसी कोई बात नहीं करूँगा जिससे कोई बुरा प्रभाव पड़े।" 

करटक कुछ देर सोच-विचार में डूबे रहने के तत्पश्चात् बोला, भाई राजा लोग बड़ी मुश्किल से ही काबू में आते हैं, क्योंकि वे सदैव चापलूसी, खुशामदी और बड़े-बड़े लोगों से घिरे रहते हैं। जो उन्हें नीचे वाले व्यक्तियों से मिलने नहीं देते, उन तक पहुँचना भी मुश्किल हो जाता है।

हाँ, भैया! मैं यह सब बात जानता हूँ और साथ ही साथ यह भी जानता हू कि मनुष्य अपनी तेज बुद्धि से ही इन सब को जीत सकता है, वह अपना मार्ग स्वयं बनाता है। बुद्धिमान व्यक्ति जब राजा तक पहुँच जाते हैं, तो यह पापी, खुशामदी लोग राजा की निगाहों में गिर जाते हैं।

यह राज बड़ी ही मुश्किलों से मिलता है क्योंकि जरा-जरा सी बुराई पर भी ब्राह्मण, क्रोध का शिकार होकर दण्ड का भागी बनता है। दमनक ने कहायह ठीक है, किन्तु जिसकी जैसी करनी वैसी भरनी। 

बद्धिमान व्यक्ति अपना स्थान स्वयं ही बनाते है, सेवक का अच्छा आचरण यही है कि वे अपने राजा का हर आज्ञा का ठीक प्रकार से पालन करें, मीठी बोली से तो पत्थर भी पिघल जाते हैं। 

राजा के गुस्सा आ जाने पर उसका हृदय प्यार से जीतें, उसकी मनचाही वस्तुओं से प्यार करें. बिना तंत्र-मंत्र के ही बुद्धिमान लोग दूसरों का हृदय जीत सकते हैं।

करटक ने अपनी हार मानते हुए कहा-“ठीक है भाई, यदि तुम्हारी यही सोच है तो तुम जरूर वही करो, जो तुमने सोचा है।" .

फिर दमनक हँसा और राजा सिंह की ओर चल दिया। Panchtantra Ki Kahaniya Video Hindi Free Download

सिंह ने जैसे ही दमनक को अपनी ओर आते देखा, तो अपने मन्त्री से कहा-“देखो वह हमारे पुराने मन्त्री का बेटा आ रहा है, इसे आदर सम्मान सहित हमारे समीप लाओ।"

जैसे ही दमनक जंगल के राजा सिंह के सामने गया तो उसने अपना सिर झुकाकर आदर सहित प्रणाम किया। जंगल का राजा सिंह अपने पुराने मन्त्री के पुत्र को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ

और अपने समीप बैठाकर प्यार से उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछने लगा, “कहो मित्र कैसे हो, बहुत दिनों के बाद मिले हो।"  

दमनक! बड़े प्यार से बोला-“महाराज! भले ही आप हमें भूल गये हों, किन्तु हम आपको कैसे भूला सकते हैं, क्योंकि हम आपके पुराने वफादार साथी हैं, आज जब हमने आपको दुःख में घिरे परेशान देखा तो हमसे नहीं रहा गया, ऐसे कठिनाई के समय ही तो आदमी को अपने पराये का पता चलता है।''
 
अपने कर्तव्य का पालन करना हमारा धर्म है महाराज, आप तो जानते ही हैं, “यदि कोई राजा अपने सेवकों के गुणों की कद्र नहीं करता तो सेवक उसका साथ नहीं देते। 

ऐसे ही जब कोई राजा अपने बुद्धिमान सेवक को नीचे ढकेलता है, तो उसके हृदय में नफरत पैदा हो जाती है।

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इसमें उस सेवक का कोई गुनाह नहीं होता, जैसे सोने के गहनों में जड़ा जाने वाला हीरा पीतल में जड़ दिया जाए तो वह हीरा न तो चमकता है न शोभा देता है परन्तु देखने वाले ही उसे, जड़ने वाले से नफरत करते हैं।' 

आपने जो मुझसे पूछा कि बहुत दिनों बाद आये हो, इसका उत्तर तो यही है कि, 'जहाँ पर दायें-बायें में कोई अन्तर न समझ पाए, वहाँ पर बुद्धिमान रुके भी तो कैसे?'

'जिस देश में जौहरी न हो वहाँ पर सागर से निकले मोतियों की कीमत नहीं लग सकती।

'जिनकी बुद्धि काँच को मणि और मणि को काँच समझती है, उसके पास सेवक क्षण मात्र को भी नहीं ठहरता।' 'जहाँ पर लाल मणि और वैद्य मणि में कोई भेद नहीं समझा जाता, वहाँ रत्नों की दुकानदारी कैसे की जा सकती है?'

'जहाँ स्वामी सब सेवकों से उनकी योग्यता और अयोग्यतादि का विचार कर-करके एक जैसा बरताव करता है, वहाँ पर बुद्धिमान सेवकों के दिल टूट जाते

'न तो बिना सेवकों के स्वामी और न बिना स्वामी के सेवक रह सकते हैं, दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।'

'जो राजा, प्रजा का मन न जीत सके, अर्थात् जनहित के काम न करे, उसे किरणों के बिना सूरज ही कहा जा सकता है।' 'जो स्वामी खुश होकर अपने वफादार बहादुर सेवकों को इनाम प्रदान करता है, वही सेवक समय आने पर राजा के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देता। जो सेवक गर्मी, सर्दी, भूख आदि से नहीं घबराता वही वफादार हो सकता।

दमनक की ज्ञान-भरी बातें सुनकर पिंगलक बोला

“अच्छा ऐसा ही होगा! तुम यदि कुछ करने योग्य हो अथवा नहीं, आखिर हमारे मन्त्री के पुत्र हो, इसलिए जो कुछ भी कहना चाहते हो, बेझिझक कहो।"

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“मैं तो केवल निवेदन ही करना चाहता हूँ देव!" 

“तो फिर संकोच किस बात का है? जो कहना है साफ-साफ कहो!" पिंगलक ने मुस्कुराते हुए कहा। “देखो मित्र, राजा का जो भी काम हो, उसे सबके सामने नहीं एकान्त में कहना चाहिये, क्योंकि गुप्त बात छह कानों में जाने से किसी भी कठिनाई का कारण बन सकती है।"

पिंगलक ने दमनक की बात को बड़े ध्यानपूर्वक सुना और बात उसके दिल को छूने लगी, फिर उसने अपनी नजर के इशारे से वहाँ पर बैठे सब जानवरों को जाने के लिये कहा। 

“हे जंगल के स्वामी, अब आप बताओ कि जिस वक्त आप नहर के समीप प्यास बुझाने के लिये पानी पीने गये थे, तो वहाँ पर से आप वापस क्यों लौट आये?"

शेर ने हँस कर कहा, “वैसे ही...।"

"स्त्रियों से, दोस्तों से, युवा मित्रों से गोपनीय बात कुछ-न-कुछ छुपा लेनी चाहियें, परन्तु यह बात उचित है या नहीं ऐसा सोचकर बुद्धिमान को चाहिये कि अपनों के अनुरोध पर गुप्त से गुप्त बात भी वक्त आने पर कह दे।"

दमनक की बात सुनकर शेर सोच-विचार में पड गया, क्योंकि उसकी बात में जान थी, फिर वह एक सच्चा मित्र लग रहा था। 

मित्रों के बारे में कहा गया है-'सच्चे मित्र, वफादार सेवक, बुद्धिमान स्त्री, दयाल-कोमल हृदय मालिक के आग अपना रोना रोकर आदमी अपने दिल का बोझ हल्का कर लेता है। इसी कारण शर ने अपने मन की बात होंठों पर लाते हुए कहा, “श्रीमान मैं इस जंगल से जाना चाहता हूँ।"

"क्यों, जंगल का स्वामी होकर आप ऐसा क्यों सोच रहे हैं।"

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"मेरे पुराने मित्र, मैं आपसे क्या छुपाऊं, वास्तव में इस जंगल में एक अद्भुत जन्तु आ गया है. जिसकी गर्ज से ही इतनी भयंकर है कि डर के मारे कलेजा काँप उठता है जरा सोचकर देखो कि उसकी शक्ति कितनी होगी।"

दमनक ने हँसकर शेर की ओर देखा और बड़े अन्दाज से कहने लगा "महाराज, आप उसकी गर्ज से ही डर गये, आपकी यह बात ठीक नहीं है।" कहा गया है 'जल से बांध टूट जाता है। 

चौंकन्ना न रहने से गुप्त विचार प्रकट हो जाता है चगली करने से प्रेम टूट जाता है और दुःखी मनुष्य कठोर वचनों से अलग हो जाते हैं।' अपने पूर्व साथियों द्वारा उत्पन्न इस वन को छोड़ना आपके लिये उचित नहीं है।

यह बात याद रखने योग्य है कि 'अत्यन्त उग्र और भयंकर शत्रु से युद्ध होने पर भी जिसका धीरज नहीं छूटता है, वह राजा कभी भी हार का मुँह नहीं देखता। 

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गर्मी के दिनों में तालाब तो सूख जाते हैं, किन्तु सागर कभी नहीं सूखता।' जो मुसीबतों से नहीं डरता, सुख में खुश नहीं होता, मुठभेड़ में निडर, ऐसा वीर पुत्र तो कोई-कोई माँ ही पैदा कर सकती है। 

जान न होने से नम्र, निःसारता होने से लघु एवं मान रहित पुरुष का जन्म लेना ऐसा होता है जैसे तिनका, जैसे सुन्दर होते हुए भी लाख का गहना बेकार होता है, “यह सब समझ कर मालिक को धैर्य रखना चाहिये। 

इस तरह डर कर भागने से आपकी इज्जत खराब हो जायेगी, पहले मैंने भी समझा था कि यहाँ पर कोई भयंकर तथा शक्तिशाली जानवर आ गया है, पर जब देखा तो समझा था।"

“वह कैसे?" शेर ने हैरान होकर पूछा। सुनो


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